स्वामी विवेकानंद के अनमोल वचन


स्वामी विवेकानंद के अनमोल वचन

•    सर्वसाधारण जनता की उपेक्षा एक बड़ा राष्ट्रीय अपराध है। – स्वामी विवेकानंद 
•    भय से ही दुःख आते हैं, भय से ही मृत्यु होती है और भय से ही बुराइयाँ उत्पन्न होती हैं। – स्वामी विवेकानंद

•    पहले हर अच्छी बात का मज़ाक बनता है, फिर उसका विरोध होता है और फिर उसे स्वीकार कर लिया जाता है। – स्वामी विवेकानंद

•    आत्मविश्वास सरीखा दूसरा कोई मित्र नहीं। यही हमारी उन्नति में सबसे बड़ा सहयक होता है। – स्वामी विवेकानंद

•    कामनाएँ समुद्र की भाँति अतृप्त हैं। पूर्ति का प्रयास करने पर उनका कोलाहल और बढ़ता है। – स्वामी विवेकानंद


•    जब तक तुम स्वयं अपने में विश्वास नहीं करते, परमात्मा में तुम विश्वास नहीं कर सकते। – स्वामी विवेकानंद


•    जीवन का रहस्य भोग में स्थित नहीं है, यह केवल अनुभव द्वारा निरंतर सीखने से ही प्राप्त होता है। – स्वामी विवेकानंद

•    जो दूसरों से घृणा करता है वह स्वयं पतित होता है। – स्वामी विवेकानन्द

•    ‘हिंसा’ को आप सर्वाधिक शक्ति संपन्न मानते हैं तो मानें पर एक बात निश्चित है कि हिंसा का आश्रय लेने पर बलवान व्यक्ति भी सदा ‘भय’ से प्रताड़ित रहता है। दूसरी ओर हमें तीन वस्तुओं की आवश्यकता हैः अनुभव करने              के लिए हृदय की, कल्पना करने के लिए मस्तिष्क की और काम करने के लिए हाथ की। – स्वामी विवेकानंद


•    मनुष्य की महानता उसके कपडों से नहीं बल्कि उसके चरित्र से आँकी जाती है। – स्वामी विवेकानन्द
•    अभय-दान सबसे बडा दान है। — स्वामी विवेकानन्द


•    कोई व्यक्ति कितना ही महान क्यों न हो, आंखे मूंदकर उसके पीछे न चलिए। यदि ईश्वर की ऐसी ही मंशा होती तो वह हर प्राणी को आंख, नाक, कान, मुंह, मस्तिष्क आदि क्यों देता? – स्वामी विवेकानन्द


•    मौन, क्रोध की सर्वोत्तम चिकित्सा है। — स्वामी विवेकानन्द


•    महान कार्य महान त्याग से ही सम्पन्न होते हैं। — स्वामी विवेकानन्द
•    धर्म वह संकल्पना है जो एक सामान्य पशुवत मानव को प्रथम इंसान और फिर भगवान बनाने का सामर्थय रखती है। – स्वामी विवेकांनंद


•    इच्छा रूपी समुद्र सदा अतृप्त रहता है उसकी मांगे ज्यों-ज्यों पूरी की जाती हैं, त्यों-त्यों और गर्जन करता है। – स्वामी विवेकानन्द


•    आदर्श को पकड़ने के लिए सहस्त्र बार, आगे बढ़ों और यदि फिर भी असफल, हो जाओ तो एकबार नया प्रयास, अवश्य करो। – स्वामी विवेकानन्द


•    लक्ष्य को ही अपना जीवन कार्य समझो हर, समय उसका चिंतन करो उसी का स्वप्न, देखो और उसी के सहारे जीवित रहो। – स्वामी विवेकानन्द


•    जितनी हम दूसरों की भलाई करते हैं, उतना ही हमारा ह़दय शुद्ध होता है और उसमें ईश्वर निवास करता है। –

स्वामी विवेकानन्द
 •    धन से नहीं, संतान से भी नहीं अमृत स्थिति की प्राप्ति केवल त्याग से ही होती है। – स्वामी विवेकानन्द

•    इस संसार में जो अपने आप पर, भरोसा नहीं करता वह नास्तिक है। – स्वामी विवेकानन्द


•    आप ईश्वर में तब तक विश्वास नहीं, कर पाएंगे जब तक आप अपने आप में विश्वास नहीं करते। – स्वामी विवेकानन्द
•    हमारे व्यक्तित्व की उत्पत्ति हमारे विचारों में है, इसलिए ध्यान रखें कि आप क्या विचारते हैं, शब्द गौण हैं, विचार मुख्य हैं और उनका, असर दूर तक होता है। – स्वामी विवेकानन्द


•    जिसने अकेले रहकर अकेलेपन को जीता उसने सब कुछ जीता। –
स्वामी विवेकानन्द
 •    श्रद्धा का अर्थ अंधविश्वास नहीं है। किसी ग्रंथ में कुछ लिखा हुआ या किसी व्यक्ति का कुछ कहा हुआ अपने अनुभव बिना सच मानना श्रद्धा नहीं है। – स्वामी विवेकानन्द

•    जब हर मनुष्य अपने आप पर व एक – दूसरे पर विश्वास करने लगेगा, आस्थावान बन जाएगा तो यह धरती ही स्वर्ग बन जाएगी। – स्वामी विवेकानन्द


•    पीछे मत देखो आगे देखो, अनंत उर्जा, अनंत उत्साह, अनंत साहस और अनंत धैर्य तभी महान कार्य, किये जा सकते हैं। – विवेकानन्द


•    अपने सामने एक ही साध्य रखना चाहिए, जब तक वह सिद्ध न हो तब तक उसी की, धुन में मगन रहो, तभी सफलता मिलती है। – स्वामी विवेकानन्द


•    आपकी सफलता के लिएँ कईं लोग ज़िम्मेदार होंगे मगर निष्फलता के लिएँ सिर्फ आप ही ज़िम्मेदार है। – स्वामी विवेकानंद


•    उन लोगों के पास न बैठो और उन लोगों को अपने पास न बिठाओ जिनकी बातों से तुम्हारे चित्त को उद्विग्नता और अशान्ति होती है – स्वामी विवेकानन्द, 

•    हर अच्छे, श्रेष्ठ और महान कार्य में तीन चरण होते हैं, प्रथम उसका उपहास उड़ाया जाता है, दूसरा चरण उसे समाप्त या नष्ट करने की हद तक विरोध किया जाता है और तीसरा चरण है स्वीकृति और मान्यता, जो इन तीनों चरणों   में बिना विचलित हुये अडिग रहता है वह श्रेष्ठ बन जाता है और उसका कार्य सर्व स्वीकृत होकर अनुकरणीय बन जाता है। – स्वामी विवेकानन्द

•    जागें, उठें और न रुकें जब तक लक्ष्य तक न पहुंच जाएं। – स्वामी विवेकानंद

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